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हम भी बैरागी हो गये होते

Posted On: 3 Oct, 2013 कविता में

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रूप रंग व श्रृंगार न होता
रूठन व मनुहार न होता
तो हम भी बैरागी हो गये होते

चातक की प्यास न होती
मिलने की आस न होती
तो हम भी बैरागी हो गये होते

प्रीत के ये प्रसंग न होते
रिश्तो के अनुबन्ध न होते
तो हम भी बैरागी हो गये होते

फ़ूलों में रंग न होते
सपनों के पंख न होते
तो हम भी बैरागी हो गये होते

जिह्वा के स्वाद न होते
देह के अनुराग न होगे
तो हम भी बैरागी हो गये होते

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Keshar Singh के द्वारा
October 3, 2013

जिह्वा के स्वाद न होते देह के अनुराग न होगे तो हम भी बैरागी हो गये होते सुन्दर पंक्तिया आभार


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