दिल का दर्पण

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बेडियां

Posted On: 22 Feb, 2013 में

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अहसासों में जी कर हमने

लफ़्जों के यह जाल बुने हैं

वक्त अब है जिद कर बैठा

इन तारों पर चलना होगा

दिल से जब भी पूछा हमने

उसने बस यह बात कही है

प्यार की राह में अंगारे हैं

इन तलवों को जलना होगा

तेरे साथ से क्या पाया हमने

कोई पूछे तो क्या बतलायें

खुद की भी है खबर नहीं अब

जाने कब तुझ से मिलना होगा

शह और मात न जानी हमने

जख्म पा कर भी हैं मुस्काये

नाम न आये इन सब में तेरा

इसलिये लबो को सिलना होगा

मोहिन्दर कुमार

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sushma Gupta के द्वारा
March 11, 2013

मोहिन्दर जी, प्रेम में अहसासों की ‘बेड़ियाँ ‘ है , इसीसे तो उसकी महानता का अहसास हो पाता है ,बहुत खूवसूरत कविता है , वधाई ..

    Mohinder Kumar के द्वारा
    April 10, 2013

    धन्यवाद सुषमा जी

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
February 24, 2013

आदरणीय, बहुत ही सुन्दर और दिल को छु लेने वाली आपकी यह कविता मुझे बहुत पसंद आयी| नाम न आये इन सब में तेरा इसलिये लबो को सिलना होगा|

    Mohinder Kumar के द्वारा
    April 10, 2013

    ध्वलिमा जी रचना को पसन्द करने के लिये आभार

shashi bhushan के द्वारा
February 23, 2013

आदरणीय मोहिन्दर जी, सादर ! “”शह और मात न जानी हमने मिले जख्म फिर भी मुस्काये नाम न आये इन में तेरा पुनः लबो को सिलना होगा !! जिद कर बैठा आज वक्त है इन तारों पर चलना होगा !”" बहुत सुन्दर ! भावनाओं का बेहतरीन सम्प्रेषण ! हार्दिक बधाई !

    Mohinder Kumar के द्वारा
    April 10, 2013

    रचना पसन्द करने के लिये आभार शशी भूषण जी.

akraktale के द्वारा
February 23, 2013

वाह! सुन्दर रचना आदरणीय मोहिंदर जी. दिली दाद कुबुलें.


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