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सोचता हूं पूछ ही लूं तुम से - कविता

Posted On: 19 Nov, 2012 में

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यूं तो
अधिकार तनिक नहीं, फ़िर भी
सोचता हूं कि पूछ ही लूं तुम से
किस संकल्प हेतू ढोया तुमने
यह एकेलापन
स्वपनों का होम कर
प्रतिकार में हाथ जलाये
सोचता हूं कि पूछ ही लूं तुम से

क्या है जिसे
उर उमंग बना
हंस लेती हो
किस तरह
रेत के सपाट तल पर
भावनाओं की नाव खेती हो
सोचता हूं कि पूछ ही लूं तुम से

क्यों नैनों के द्वार पर
लगा पलकों का पहरा है
कौन राज ह्र्दय में
पैठ मारे गहरा है
सोचता हूं कि पूछ ही लूं तुम से

किंचित फ़ूलों का मौसम
अभी नहीं बीता है
अंकुर बिम्बों का
आज भी जीता है
हरित है, चाहे पलाश नहीं
जीवन्त राहे हैं
भविष्य की सोच कर
वर्तमान हताश नहीं
सोचता हूं कि पूछ ही लूं तुम से

मोहिन्दर कुमार
http://dilkadarpan.blogspot.com



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35 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
November 28, 2012

आदरणीय मोहिंदर कुमार जी, संवेदना तथा अनुभूति से उपजे अत्यंत अर्थवान, प्रभावपूर्ण और पठनीय रचना के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “क्यों नैनों के द्वार पर लगा पलकों का पहरा है कौन राज ह्र्दय में पैठ मारे गहरा है सोचता हूं कि पूछ ही लूं तुम से”

yamunapathak के द्वारा
November 27, 2012

अंकुर बिम्बों का आज भी जीता है हरित है, चाहे पलाश नहीं जीवन्त राहे हैं भविष्य की सोच कर वर्तमान हताश नहीं सोचता हूं कि पूछ ही लूं तुम से मोहिंदर जी बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं.

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 27, 2012

    यमुना जी, उत्साहवर्धन के लिये आभार.

vinitashukla के द्वारा
November 27, 2012

कोमल भावनाओं का सुन्दर इज़हार. बधाई मोहिंदर जी.

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 27, 2012

    धन्यवाद विनीता जी..पाठकों के उत्साह वर्धन से ही लेखन सम्भव है

अजय यादव के द्वारा
November 23, 2012

आदरणीय मोहिन्दर साहब , सादर प्रणाम… ” जीवन्त राहे हैं भविष्य की सोच कर वर्तमान हताश नहीं सोचता हूं कि पूछ ही लूं तुम से” बड़ी उम्दा पंक्तियाँ हैं |सादर आभार | http://avchetnmn.jagranjunction.com/

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 27, 2012

    रचना को पसन्द करने के लिये आभार अजय जी.

ashishgonda के द्वारा
November 23, 2012

बहुत सुन्दर कविता, भाव. काश! इतनी संक्षिप्त कविता मैं भी लिख पाता.

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 23, 2012

    उत्साहवर्धन के लिये आभार आशीष जी, स्नेह बनाये रखियेगा.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
November 23, 2012

मन के कोमल अहसासों से भरी कविता के लिए मोहिंदर जी , बधाई ! सादर !!

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 23, 2012

    उत्साहवर्धन के लिये आभार विजय गुंजन जी.

Mohinder Kumar के द्वारा
November 22, 2012

भानुप्रकाश जी, सोचना भी जरूरी है… कभी कभी जल्दबाजी मरवा देती है… वैसे मैं ना भी पूंछूं तो चलेगा.. मैं तो सामने वाली पार्टी को उकसा रहा थी कि वह असली बात बता दे… स्नेह बनाये रखियेगा.

phoolsingh के द्वारा
November 22, 2012

मोहिंदर जी प्रणाम….. अतिउत्तम रचना…… फूल सिंह

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 22, 2012

    फ़ूल सिंह जी उत्साह बर्धन के लिये आभार.

yogi sarswat के द्वारा
November 22, 2012

रेत के सपाट तल पर भावनाओं की नाव खेती हो सोचता हूं कि पूछ ही लूं तुम से क्यों नैनों के द्वार पर लगा पलकों का पहरा है कौन राज ह्र्दय में पैठ मारे गहरा है सोचता हूं कि पूछ ही लूं तुम भविष्य की सोच कर वर्तमान हताश नहीं बहुत गहरे शब्द लिखे हैं आपने श्री मोहिंदर कुमार जी ! लेकिन आपस का विश्वास , शायद आँखों से सब कुछ कह देता है ! बहुत ही सुन्दर रचना

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 22, 2012

    योगी जी, उत्साह वर्धन के लिये हार्दिक आभार

Ravinder kumar के द्वारा
November 21, 2012

मोहिंदर जी, सादर नमस्कार . जहाँ दो दिलों के मध्य भावनाओं का इतना कोमल सम्बन्ध हो वहां पूछने की जरुरत ही नहीं पड़ती. पर दिल तो दिल है. क्या है जिसे उर उमंग बना हंस लेती हो किस तरह रेत के सपाट तल पर भावनाओं की नाव खेती हो सोचता हूं कि पूछ ही लूं तुम से बेहतरीन रचना के लिए मोहिंदर जी आप को बधाई. शुभकामनाएं. नमस्ते जी.

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 22, 2012

    आभार रविन्दर जी, स्नेह बनाये रखियेगा.

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 20, 2012

बेहतरीन

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 22, 2012

    धन्यवाद यतिन्द्रनाथ जी, स्नेह के लिये आभार.

rekhafbd के द्वारा
November 20, 2012

मोहिन्दर जी जीवन्त राहे हैं भविष्य की सोच कर वर्तमान हताश नहीं सोचता हूं कि पूछ ही लूं तुम से,अति सुंदर रचना पर हार्दिक बधाई

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 22, 2012

    रेखा जी, उत्साह वर्धन के लिये आभार.

Madan Mohan saxena के द्वारा
November 20, 2012

वाह बहुत खूबसूरत अहसास हर लफ्ज़ में आपने भावों की बहुत गहरी अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है… बधाई आपको… सादर वन्दे…

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 22, 2012

    मदन मोहन जी, पाठकों का उत्साह वर्धन ही मुझे लिखने के प्रोत्साहित करता है. आभार.

Lahar के द्वारा
November 20, 2012

प्रिय मोहिंदर जी सप्रेम नमस्कार सुनदर भावों के साथ सुन्दर कविता

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 22, 2012

    धन्यवाद लाहर जी, स्नेह बनाये रखियेगा.

akraktale के द्वारा
November 20, 2012

किंचित फ़ूलों का मौसम अभी नहीं बीता है अंकुर बिम्बों का आज भी जीता है हरित है, चाहे पलाश नहीं जीवन्त राहे हैं आदरणीय मोहिंदर जी सादर यह बिम्ब तो रहेंगे सदा सदा. सुन्दर रचना बधाई स्वीकारें.

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 22, 2012

    आदरणीय अशोक जी उत्साह बर्धन के लिये हार्दिक आभार.

bhanuprakashsharma के द्वारा
November 19, 2012

आदरणीय मोहिंदर जी। यदि सोचेगो तो सोचते रह जाओगे। इसलिए पूछ ही डालो। सुंदर रचना बधाई। 

Sushma Gupta के द्वारा
November 19, 2012

आदरणीय मोहिंदर जी, मैं तो यही कहूंगी ,कि समय से पूर्व ही पूँछ लीजिये …बहुतही सुन्दर भावनाओं से ओत-प्रोत रचना….जीवन्त राहे हैं भविष्य की सोच कर वर्तमान हताश नहीं सोचता हूं कि पूछ ही लूं तुम से बहुत -बहुत वधाई सहित…….

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 19, 2012

    सुष्मा जी नमस्कार पूछना सम्भव नहीं है… यदि वहां से कोई प्रपोसल आ गया तो फ़िर पत्नी से क्या कहूंगा.. टिप्पणी के लिये आभार…स्नेह बनाये रखियेगा.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
November 19, 2012

आदरणीय मोहिंदर जी, सादर अभिवादन में तो आज तक नहीं पूँछ पाया बधाई.

    Mohinder Kumar के द्वारा
    November 19, 2012

    नमस्कार कुशवाहा जी, जहां पूछा था वहां तो शादी करनी पडी… यह तो दूसरा केस है… हा हा टिप्प्णी के लिये आभार… स्नेह बनाये रखियेगा.

    jlsingh के द्वारा
    November 27, 2012

    मैं भी नहीं ‘पूछ’ पाया….. पर मूंछों के नीचे मुस्कुराहट सब कुछ कह जाती है! भावनाएं अपने आप निकल आती हैं! पूछने की जरूरत ही नहीं, आंखे सब कुछ कह जाती है! प्रणाम महोदय! और मोहिन्दर जी को स्नेह! कभी कभी पूछने और कहने में सदियाँ गुजर जाती है तरंगे दिल से निकल दिल में समां जाती है! मोहिंदर जी दिल की गहराई से आपने शब्द संजोये हैं!

      Mohinder Kumar के द्वारा
      November 27, 2012

      उत्साह वर्धन के लिये आभार जवाहर जी. स्नेह बनाये रखियेगा


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