दिल का दर्पण

Just another weblog

41 Posts

795 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 10766 postid : 58

लकीरों के मुताबिक - गजल

Posted On: 14 Aug, 2012 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

बायसे तकलीफ़ मगर है अजीज वो मुझको
जज्वा-ए-दिल है खुद से जुदा मैं कैसे करूं

अपने ख्वाबों की बदौलत मैं यहां तक पहुंचा
है गर एक टूट गया मैं भला काहे को डरूं

रात की चादर में हों चाहे लाख अंधेरे सिमटे
जुगनू बन के सही कोई कोना रोशन तो करूं

ओढ कर खोल कोई न जिया जायेगा मुझसे
क्यों न हालात से लड मौत मैं खुद की मरूं

कुछ तो करना है हाथ की लकीरों के मुताबिक
चाहता हूं कुछ एक रंग अपनी मर्जी के भरूं

मोहिन्दर कुमार
http://dilkadarpan.blogspot.in



Tags:                 

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 3.60 out of 5)
Loading ... Loading ...

25 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shwetamisra के द्वारा
February 7, 2013

बेहतरीन ग़ज़ल बन पड़ी है …… बधाई

    Mohinder Kumar के द्वारा
    February 8, 2013

    शुक्रिया श्वेता जी, स्नेह बनाये रखियेगा

Rajkamal Sharma के द्वारा
August 22, 2012

आपसे गुजारिश है की अपने फिंगरप्रिंट को भिजवाने की किरपालता कीजियेगा फिर आपको भरने वाले रंगों के बारे में विस्तार से बतलाया जाएगा वैसे इस कविता का रंग भी अच्छा लगा मुबारकबाद

    Mohinder Kumar के द्वारा
    August 28, 2012

    राजकमल जी, फ़िंगर प्रिंट चाहिये तो आपको या तो आना पडेगा या किसी को भेजना पडेगा… अपुन तो घूमने घूमाने में विश्वास रखते नहीं… ही ही.

Rahul Nigam के द्वारा
August 22, 2012

मोहिंदर जी, बहुत सुन्दर भाव. “कर ले फराहम कुछ तिनके लोगो के भी वास्ते, कहीं गुम न हो जाय असर, आदमी होने का”

    Mohinder Kumar के द्वारा
    August 28, 2012

    राहुल जी, उत्साहवर्धक शब्दों और दिलकश शेर के लिये आभार.

phoolsingh के द्वारा
August 16, 2012

mohinder singh ji namskar, bahut hi sunder gajal sir, phool singh

    Mohinder Kumar के द्वारा
    August 28, 2012

    धन्यबाद फ़ूलसिंह जी.

shashibhushan1959 के द्वारा
August 15, 2012

आदरणीय मोहिंदर जी, सादर ! बहुत गंभीर रचना ! स्वयं से स्वयं का अहसास ! “”कुछ तो करना है हाथ की लकीरों के मुताबिक चाहता हूं कुछ एक रंग अपनी मर्जी के भरूं”" क्षमा प्रार्थना के साथ इन दो पंक्तियों का सामंजस्य नहीं समझ पाया ! “होता तो है सब हाथ की लकीरों के मुताबिक चाहता हूं कुछ एक रंग अपनी मर्जी के भरूं”" सादर !

    Mohinder Kumar के द्वारा
    August 16, 2012

    शशीभूषण जी, नमस्कार, रचना के गूढ मंथन के लिये आभार. मेरा अभिप्राय वही है जो आपकी परिवर्तित पंक्ति का है. मनुष्य जीवन में अपनी नीयति और किस्मत के अनुसार ही कार्य करता है परन्तु उसके मन में कुछ अपने मन का कर गुजरने की हमेशा ईच्छा रहती है. स्नेह बनाये रखियेगा.

dineshaastik के द्वारा
August 15, 2012

रात की चादर में हों चाहे लाख अंधेरे सिमटे जुगनू बन के सही कोई कोना रोशन तो करूं महेन्दर जी, सादर नमस्कार। बहुत ही सुन्दर विचारों की अभिव्यक्ति…. बधाई…

    Mohinder Kumar के द्वारा
    August 16, 2012

    दिनेश जी, नमस्कार, उत्साहवर्धक शब्दों के लिये आभार..

rajuahuja के द्वारा
August 14, 2012

बायसे तकलीफ मगर , है अज़ीज़ वो मुझको , ज़ज्बा-ए-दिल है , खुद से जुदा कैसे करूँ ! वाह मोहिंदर जी ! सुभानल्लाह ,बहुत खूब ! दिल को छूता शैर ………..साधुवाद !

    Mohinder Kumar के द्वारा
    August 16, 2012

    आहुजा जी, नमस्कार, स्नेह के लिये आभार….

D33P के द्वारा
August 14, 2012

क्यों न हालात से लड मौत मैं खुद की मरूं कुछ तो करना है हाथ की लकीरों के मुताबिक चाहता हूं कुछ एक रंग अपनी मर्जी के भरूं…. काश हम अपने हाथ की लकीरों में अपनी पसंद के रंग भर सकते .

    Mohinder Kumar के द्वारा
    August 16, 2012

    दीप्ति जी, नमस्कार, हर आदमी की यही इच्छा रहती है कि वह जीवन की कठिनाईयों ले लड कर अपना मन भाया कुछ कर पाये.. उत्साह वर्धन के लिये आभार.

akraktale के द्वारा
August 14, 2012

मोहिंदर जी               सादर, कुछ कर गुजरने कि कशमकश पर लिखी सुन्दर भावों से सजी रचना के लिए बधाई. यदि शिल्प में कुछ सुधार होता तो गेयता और अच्छी बनती. 

    Mohinder Kumar के द्वारा
    August 16, 2012

    अशोक जी, स्नेह के लिये आभार… आपका कहना सही है… इसे सुर में गाने लायक बनाने के लिये और मेहनत की आवशयकता है. उत्साह वर्धन के लिये आभार.

yamunapathak के द्वारा
August 14, 2012

चाहता हूं कुछ एक रंग अपनी मर्जी के भरूं मोहिंदर जी ग़ज़ल के ज़ज्बात बहुत ही खुबसूरत हैं.जुगनू,खोल,इन दो प्रतीकों से आप ने भाव बहुत ही ज्यादा प्रबल किया है जो बेहद अछा लगा,आशावाद से लबरेज़ ग़ज़ल धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
August 14, 2012

सदा की भांति एक सुन्दर प्रस्तुति मोहिन्दर जी रा त की चादर में हों चाहे लाख अंधेरे सिमटे जुगनू बन के सही कोई कोना रोशन तो करूं ओढ कर खोल कोई न जिया जायेगा मुझसे क्यों न हालात से लड मौत मैं खुद की मरूं

    Mohinder Kumar के द्वारा
    August 14, 2012

    निशा जी, नमस्कार, दिल की बात पाठकों तक पंहुचे इस से बडी बात एक लेखक के लिये क्या हो सकती है… स्नेह बनाये रखियेगा.

ashishgonda के द्वारा
August 14, 2012

बहुत ही खूबसूरत गज़ल, आपके लेखनी को प्रणाम. कृपया इधर भी ध्यान दें—- आदरणीय! आपने बहुत गंभीर मुद्दे पर बहुत उन्दा आलेख लिखा है, जिसके लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं. कृपया इधर भी ध्यान दें— http://ashishgonda.jagranjunction.com/2012/08/13/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A8/

    Mohinder Kumar के द्वारा
    August 14, 2012

    धन्यवाद आशीष जी

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 14, 2012

आदरणीय मोहिंदर जी, सादर वाह क्या जज्बा है, सलाम

    Mohinder Kumar के द्वारा
    August 14, 2012

    प्रदीप जी, नमस्कार, गजल को पसन्द करने के लिये आभार… स्नेह बनाये रखियेगा


topic of the week



latest from jagran