दिल का दर्पण

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Mohinder Kumar


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शरीर एँव आत्मा – नाव एँव यात्री

Posted On: 21 Apr, 2015  
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कविता में

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बाजार अनूठे – कविता

Posted On: 9 Jan, 2014  
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कविता में

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हम भी बैरागी हो गये होते

Posted On: 3 Oct, 2013  
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कविता में

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” हिन्दी बाजार की भाषा है…….. CONTEST”

Posted On: 18 Sep, 2013  
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” नव परिवर्तनों के दौर में हिन्दी ब्लोगिंग – CONTEST”

Posted On: 18 Sep, 2013  
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“जीवाश्म”

Posted On: 25 Jun, 2013  
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बेडियां

Posted On: 22 Feb, 2013  
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जिन्दगी – गजल

Posted On: 8 Feb, 2013  
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सभ्य समाज का विभत्स रूप

Posted On: 7 Jan, 2013  
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social issues में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

हिंग्लिश स्वरूप निश्चय ही हिन्दी के के प्रसार को बढावा ही दे रहा है.. इससे इंगलिश जानने वालों की भी इसमें रूचि बनी रहती है और वह भी इस बात से प्रसन्न हैं कि उनका भी हिन्दी पर कुछ न कुछ अधिकार तो है ही. अब रही यह बात कि इससे हिन्दी को व्यापक स्वीकार्यता मिलेगी या नहीं तो यह स्वीकार्यता हम किस रूप में और किस से पाना चाहते है उस पर निर्भर है. भाषा के रूप में, भाव के प्रसार के रूप में, कही गई बात को गन्तव्य तक पंहुचानें में तो कहीं कोई कमी नजर नहीं आती. परन्तु हमें यह नहीं भूल जाना चाहिये कि हिन्दी और अंग्रेजी के शब्दों का मिश्रण वाक्य के रूप में एक बात है परन्तु हिन्दी के शब्दों को तोड मरोड कर ऐसा रूप देना जिनका एकाकी रूप से कोई अर्थ ही न निकले निश्चय ही हिन्दी भाषा से खिलवाड होगा और इसके प्रति सचेत रहने की आवशकता है. अच्छी बात कही है आपने!

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मोहिंदर जी, सत्य तो यही है की यह उस लड़के-लड़की की ही लाईफ है अरेंज मैरिज की बहुत सी कुरीतियाँ जैसे जाती-धर्म में शादी करना, दहेज़ प्रथा को बढ़ावा देना, बहु को स्वतंत्रता न दिया जाना इत्यादि आज लव मैरिज की वजह से कुछ हद तक कम हो पायी हैं हम जब किसी संपत्ति के मालिक होते हैं तब हम उसके साथ कोई भी व्यवहार कर सकते हैं किन्तु इंसानों की अपनी भावनाएं और व्यक्तिगत इच्छाएं होती हैं इसलिए किसी अन्य स्वस्थ मष्तिष्क वाले बालिग़ इंसान की व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में फैसला करने का हक हमारा नहीं, भले ही हम उसके रिश्ते में बाप ही क्यों न हो.... हाँ बच्चों को कोई भी कदम उठाने से पहले अपने माँ-बाप की रजामंदी लेने की पूरी कोशिश करनी चाहिए तथा उनके विचारों को भी सुनना और समझना चाहिए...फिर जो उसे सही लगे वह करना चाहिए...

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

आदरणीय मोहिन्दर साहब सादर प्रणाम , खलील जिब्रान ने कहा हैं "आपके बच्चे दरअसल आपके नही हैं |वे आपके माध्यम से आये हैं किन्तु आपके द्वारा नही|यद्यपि वे अभी आप्केसाथ हैं किन्तु आपके नही हैं |आप उन्हें अपना प्यार दे सकतें हैं किन्तु अपने विचार नही |क्यूंकि उनके पास उनके अपने विचार हैं |आप उनके शरीर को घर दे सकते हैं किन्तु उनकी आत्मा को नही |आप उनके जैसा बन्ने को सोच सकते हैं किन्तु अपने जैसा बनाने की कोशिश ना करें " हमारे अभिभावक [माँ-बाप ]हम बच्चों से बहुत आपेक्षाएं रखते हैं | बहुधा यह ठीक भी हैं किन्तु ये आपेक्षाये ही बच्चे की उन्नति,पढ़ाई या शिक्षा में बाधक बन सकती हैं ,इस कारण से बच्चा ना तो पढ़ाई में ना ही अपनी पसंद के क्षेत्र में अस्छा कर पाता हैं और अभिभावकों द्वारा थोपे गए क्षेत्र में भी अच्छा नही कर पाता | आपका अजय

के द्वारा: ajaykr ajaykr

मान्यवर जिस विषय के संबंध में आलेख हो, उसी संबंध में प्रतिक्रिया दे। इस संबंध में आप मेरे आलेख पढ़े आप मेरे आलेख पढ़े, आपकी निश्चित रूप से काँग्रेस विचारधारा से ग्रसित हैं। यह एक गंभीर बीमारी है। भारत के पतन का कारण भी यही है। चूँकि काँग्रेसी संस्कृति में स्वयं की(सोनिया जी आदि की) आलोचना स्वीकृत नहीं हैमैंने आपके काँग्रेस संबंधी आलेख की आलोचना की थी संभवतः आपको वह आलोचना स्वीकृत नहीं हुई। अतः आप इस तरह की अनीति अपना रहे हैं। मै न तो आपका मार्गदर्शन करने में समर्थ हूँ और न ही बाध्य हूँ। आप स्यवं स्वयं भू गुरू हैं। अतः उत्तर की स्वयं ही खोज करें तो आपसे अधिक मुझे खुशी होगी। मेरा मानना है कि आपका जैसा उद्देश्य हो फल का अनुभव भी उसी के अनुरूप होता है। क्षमा चाहता हूँ, आपके उद्देश्य के कारण आपको निराश कर रहा हूँ।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

मैं भी कृष्ण को महान मानता हूँ किन्तु उनके कुछ कृत्य मानवीय दृष्टि से क्षम्य नही ं हैं। हो सकता है कि मेरे विचारों से कोई सहमत न हो किन्तु मैं तार्किक कारणों से अपने विचारों पर अटल हूँ। दिनेश “आस्तिक” जी ..... आपने अपनी प्रतिकिर्या में जिन तार्किक कारण का उल्लेख किया है मैं तुच्छ प्राणी उनकी विस्तारपूर्वक व्याख्या जानना चाहता हूँ ताकि मेरा ज्ञानवर्धन हो सके और मैं अज्ञानी आपसे कुछ ज्ञान पा सकू ..... किरपा करके मेरा मार्गदर्शन कीजिये ..... उम्मीद है की आप मुझको निराश नहीं करेंगे ..... :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D (mohindr जी ..... इस बेहतरीन कविता ने आपका कद निसंदेह ही काफी ऊँचा कर दिया है )

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

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आदरणीय jj , नमस्कार आज सुबह से आलेख “अन्ध्रेरे के आधार पर विकास करता झारखण्ड ” जिसने आपने featured ” में डाला हुआ है जिसे सुश्री खुसबू जी ने अपने विचार कह के पोस्ट किया हुआ है … वो पूरा का पूरा आलेख टाइप (चोरी ) किया हुआ है प्रथम पैर को छोड़ के … सीर्फ आकड़ा होता तो मैं आपके संज्ञान में नहीं लाती क्योंकि इस तरह के आलेख के लिए आकडे कहीं न कहीं से उठाने होते है . पर चुकी महोदया ने पूरा आलेख ही चोरी का टाइप कर दिया है और संदर्भ भी नहीं दिया है … तो सवाल उठाना स्वाभविक है / आपके जानकारी के लिए बता दू इस आलेख की लेखिका अनुपमा जी है .. जो मर्ज कुछ , दवा कुछ ” के नाम से “तहलका ” के अंक 31may2012 में प्रकाशित है पेज 40-41 में .. चूँकि आप ने सुबह से इसे फीचर किया हुआ है और कल को आप इसे बेस्ट ब्लॉग अफ डी विक भी कर देंगे … तो जानना चाहती हूँ आपकी नजर में ये कहाँ तक उचित है .. क्या जो अपनी स्वरचित और लिखित लेख लिखते हैं क्या उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी .. तो फिर हम भी क्यों मेहनत करे … http://kg16.jagranjunction.com/2012/05/23/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%b0

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

आदरणीय मोहिंदर जी , पता नहीं कैसे एक से बढ़ कर आपकी रचना पढने से कैसे वंचित रह गयी .. क्या कहूँ ह्रदय को छु गयी आपकी अम्बा के प्रति दी गयी श्रन्धान्जली , सच कहूँ तो हर नारी कहीं न कहीं कभी ना कभी अम्बा जैसी ही मानसिक और सामाजिक स्थिति से गुजरती है ... जब उसे लगता है .. उसके अरमानो को न उसके पिता न बही और न प्रेमी या पति समझता है बस अपने पुरुष अहम में . उसकी कोमल भावनाओ को दरकिनार कर अपने आन बाण के शान में ... उसे तुच्छ बना देते है .... यतः अम्बा की पीड़ा हर नारी की पीड़ा है जो कंही न कंही छली गयी है .. अतः आज भी अम्बा उतनी ही प्रासंगिक है जितना वो द्वापर युग में थी .. क्योंकि समाज में नारी की स्थिति कमोवेश वही है जो पहले थी .. वो कितना भी बुद्धिमान , तर्क्वान और सुंदर हो .. पर .....उसे कमजोर करने में समाज कभी पीछे नहीं रहता ... ह्रदय से बधाई आपको .

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria




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